अब तक तीन शहर , अब किसकी बारी
मैंने कुछ ग़लत लिखा हो तो उसे माफ़ करें और बिना पड़े कमेन्ट बॉक्स न भरें , यदि समझ मैं आए तो मुद्दे पर ज़रूर लिखें
चलो अब दूर चलें

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चलो अब दूर चलें ,
होने अब हम बे नूर चलें ।
रंग रोगन को हम भी छोडेंगे ,
अलविदा कहने से पहले दूर चलें ।
आओ अंधेरे को हम भी ढूँढेंगे ,
चिराग हाथ मैं लिए बहुत दूर चलें ।
चिराग बुझ ना सके की अँधेरा मिल जाएगा ,
चलो ज़ख्म को बनाने नासूर चलें ।
किसी कोने मैं चल के बैठेंगे ,
किसी आहट से सहमे बैठेंगे ।
सबको भुलाने बदस्तूर चलें ,
चलो अब दूर बहुत दूर चलें ।
चलो के चल के ही मिट जायेंगे ,
कभी रुक ना जाना की थक जायेंगे ।
वापस ना तेरे घर ना मेरे घर जायेंगे ,
चलो अब दूर चलें
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बंद हो बंद
आज सुबह NDTV पर ११ बजे के समाचारों मैं जम्मू बंद की ख़बर थी , ख़बर तो वैसे थी जैसी होती है पर ख़ास बात थी उसका विडियो ,विडियो मैं भारतीय समाज के रक्षक बजरंग दल और हिंदुत्व की प्रेरणा बने भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता शहर मैं बंद को न मानने वालों
के साथ जो कर रहे थे उसे देख कर लगा की असली अलगाववादी तो ये ही हैं । एक पी सीओ बूथ को उन्होंने तोडा ,हाथों मैं lआठियाँ थी और बत्तमीजी इतनी की कोई मर जाए कोई फिकर नही , पुरी दुकान तोड़ डाली ,मैंने ये देखने के बाद एक पल को सोचा की ये कैसे शिव भक्त पर फिर लगा की इन आतंकवादियों का कोई धरम नही होता । इतना ही काफी नै था पास से निकल रहे एक दूध के डबरों से भरे एक ट्रक को रोका और एक एक कर के पुरे डबरे निचे फेकना शुरू कर दिया , सेंकडो लीटर दूध फ़ेंक दिया बिना ये सोचे की ये किसी की बेटी के लिए तो किसी की दादी के लिए कितना ज़रूरी था , इस बात को वे अपना धर्म कहते हुए आगे बड़े होंगे जहाँ उनकी माँ का दूध का क़र्ज़ उन्होंने उतर दिया है ,और अब वे खुले हैं जो करना कहते हैं कर सकते है । हमारे एक टीचर हैं श्री जीतेंद्र सुमन , वे नास्तिक हैं और फिलहाल भारत मैं धर्म से सम्बंधित विषय पर PHD कर रहे हैं । वे धार्मिक अवसदियों से सख्त नफरत करते हैं ,मैं तीन साल तक उनके साथ रहा हमेशा उनसे ये कहता रहा की आप कभी न कभी धर्म पर विश्वास करे लगेंगे ,पर आज जब टी वी पर ये मंज़र देखा तो दिल खट्टा हो गया , मैं मानता हूँ की ऐसे लोगों को उठा के बंद कर देना चाहिए ,जो धर्म को कन्धा बना कर अपना काम निकलवा रहे हैं ।
मैं कहीं से भी कश्मीरी अलगावादियों का समर्थन नही कर रहा पर अब शायद बहुत हो गया है और देश के लोगों को समझना चाहिए की इन सब बातों मैं देश का भला नही हो सकता , शायद ख़ुद का भी नही । शायद बाबा आंबेडकर ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात को संविधान मैं शामिल करते समय नही सोचा होगा की बात इस हद तक पहुँच सकती है । अब तो ज़रूरत है की ये बंद बंद हों , सरकारों से तो उम्मीद नही है की ऐसा कुछ भी करेंगे पर शायद सुप्रीम कोर्ट को ही कुछ कर पाए
खैर कोई त्रुटी हो तो खम करें , पर ये नालायक लोग लिखने पर मजबूत कर देते हैं , हालाँकि मेरे ब्लॉग का ये मूड नही है । फिर मिलते हैं ...
मार डालेगी महंगाई
,या रेपोरेट बढाएं , क्या करें कहाँ जायें कोई कोना ही नही बचा जहाँ मुँह छुपाएँ । मनमोहन सिंह जी के लिए और भी परेशानी की बात है क्योंकि पहले भी जब वह वित्त मंत्री थे , तब ६ मई १९९५ को इन्फ्लेशन ११.११ प्रतिशत तक पहुँच गया था , है रे किस्मत अब प्रधान मंत्री की कुर्सी भी नही छोड़ी किस्मत ने , वैसे भी अमेरिका के साथ समझौते से हाथ पीछे खिचेने का विचार तो वह बना ही चुके हैं , वाम दल जो नाक मैं दम किए हुए है । 