अब तक तीन शहर , अब किसकी बारी
मैंने कुछ ग़लत लिखा हो तो उसे माफ़ करें और बिना पड़े कमेन्ट बॉक्स न भरें , यदि समझ मैं आए तो मुद्दे पर ज़रूर लिखें
चलो अब दूर चलें

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चलो अब दूर चलें ,
होने अब हम बे नूर चलें ।
रंग रोगन को हम भी छोडेंगे ,
अलविदा कहने से पहले दूर चलें ।
आओ अंधेरे को हम भी ढूँढेंगे ,
चिराग हाथ मैं लिए बहुत दूर चलें ।
चिराग बुझ ना सके की अँधेरा मिल जाएगा ,
चलो ज़ख्म को बनाने नासूर चलें ।
किसी कोने मैं चल के बैठेंगे ,
किसी आहट से सहमे बैठेंगे ।
सबको भुलाने बदस्तूर चलें ,
चलो अब दूर बहुत दूर चलें ।
चलो के चल के ही मिट जायेंगे ,
कभी रुक ना जाना की थक जायेंगे ।
वापस ना तेरे घर ना मेरे घर जायेंगे ,
चलो अब दूर चलें
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शब्दों को जोड़कर यूँ ही
पिछले तीन दिनों से बिल्कुल भी समय नही मिला की कुछ लिखूं और जब समय मिला तो कुछ भी तैयार नही था ,अभी मुझे अपनी एक पुरानी कविता की कुछ पंक्तिया याद आयीं ,पुरी तो नही पर कुछ हिस्सा लिखने की इक्षा है । दिन का ढेर सारा समय हिन्दी ब्लोग्स पड़ने में बीत जाता है , फिर भी कुछ ठोस नही मिल रहा की अपने से कुछ लिख सकूँ , कुछ दिनों पहले रविश जी के ब्लॉग पर मैंने पड़ा उन्होंने विज्ञापन का अंडरवियर काल शीर्षक से एक पोस्ट लिखी थी ,पड़कर बड़ा सुकून हुआ और अपने टीचर श्री मनोहर श्याम चौरे जी की याद आई ,वे बहुत ऊँचे कोटि के पत्रकार रहे हैं , आजकल माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्विद्यालय मैं अपनी सेवाएँ दे रहे हैं , वे हमेशा हमें बताते रहते है के लिखने के लिए विषय से ज्यादा जरूरी है इक्षा का होना ,आप के पास हजारों के तादाद मैं विषय होते हैं , सुबह के उठने से लेकर रात को सोने तक ,सुई से तलवार तक और साइकिल से मोटर कार तक ,आप लोगों के ऊपर लिख सकते है ,भगवन को चढाय जाने वाले भोगों के ऊपर लिख सकते है और अगर थोडी ठीकठाक जानकारी रखते हों तो बरसात मैं होने वाले रोगों पर भी लिख सकते हैं ,पर अब तीन साल की पडी के बाद लगता है की सब मट्टी पालित हों गई कुछ भी ढंग का नही सीखा । खैर अभी भी कुछ नही गया है ,बहुत कुछ हों सकता है ,किया जा सकता है ।
वादे के मुताबित अब मैं एक कविता भी लिख रहा हूँ ,मैं जानता हूँ की अभी मैं अच्छा नही लिख पता पर फिर भी मैं कोशिश कर रहा हूँ,ये कविता मैंने काफी पहले कुछ लिखे के ऊपर ही लिखी थी
शब्दों को जोड़कर यूँ ही कुछ कहा जाता है क्या ,
अपना गुस्सा इन शब्दों पर उतरा जाता है क्या ,गलतियाँ ख़ुद करें बड़े आप बने , और कहें सारा जहाँ ख़राब है , इससे काम चलता है क्या , बदलावों को महसूस किया शायद ये अच्छा है ,पर अच्छा है महसूस किया ये अच्छा है क्या ।
कट कॉपी पेस्ट और हम
फिर मिलते हैं वंदे मातरम